बिहार विधानसभा चुनाव 2025 की मतगणना शुरू होते ही राज्य की राजनीति एक बार फिर राष्ट्रीय सुर्खियों में आ गई, जहाँ शुरुआती रुझानों ने न केवल एनडीए को बढ़त दिलाई बल्कि भाजपा और जदयू के बीच ‘सबसे बड़ी पार्टी’ बनने की होड़ ने पूरे चुनावी माहौल को और अधिक तीखा, दिलचस्प और उच्च-दांव वाला बना दिया। शुक्रवार सुबह 8 बजे से ही मतगणना के पहले दौर—डाक मतपत्रों—ने संकेत देना शुरू कर दिया था कि बिहार की राजनीतिक दिशा किस ओर घूम सकती है, और इसी के साथ राज्य के भीतर सत्ता के भविष्य को लेकर उत्सुकता बढ़ती चली गई।
एनडीए की मजबूत बढ़त और भाजपा–जदयू के भीतर की प्रतिस्पर्धा
सुबह 11:15 बजे चुनाव आयोग के अपडेट ने राजनीतिक तस्वीर को और स्पष्ट कर दिया। भाजपा 83 सीटों पर और जदयू 79 सीटों पर आगे थी। इन दोनों की संयुक्त बढ़त ने एनडीए को 188 सीटों का मजबूत आधार दिलाया, जबकि महागठबंधन 44 सीटों पर सिमटता हुआ दिखा। इन रुझानों ने यह संकेत दे दिया कि जनता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के चुनावी संदेशों और मुख्यमंत्री नीतीश कुमार की विकास-नीति पर भरोसा जताया है। दोनों नेताओं की चुनावी रैलियों, संदेशों और अभियान रणनीतियों ने राज्य के विभिन्न सामाजिक और भौगोलिक वर्गों में प्रभाव डाला, जिसका परिणाम शुरुआती बढ़त के रूप में सामने आया।
इस चुनाव का एक महत्वपूर्ण पहलू भाजपा और जदयू के बीच का आंतरिक शक्ति-संतुलन था। भले ही दोनों दल एनडीए के भीतर सहयोगी हैं, लेकिन बिहार की राजनीति में कौन बड़ी भूमिका निभाएगा—यह सवाल पूरे चुनाव अभियान के दौरान चर्चा का केंद्र बना रहा। भाजपा अपनी राष्ट्रीय छवि और प्रधानमंत्री मोदी के प्रभाव पर निर्भर थी, जबकि जदयू का आधार राज्य की जड़ों में अधिक व्यापक और ऐतिहासिक रूप से मजबूत माना जाता है। इसलिए, दोनों दलों के बीच सीटों का अंतर बाद की राजनीतिक संरचना और सरकार के भीतर निर्णायक पदों के वितरण को प्रभावित करेगा।
नीतीश कुमार का राजनीतिक अनुभव और गठबंधन राजनीति पर उनकी पकड़ हमेशा बिहार की सत्ता संरचना का एक अहम हिस्सा रहा है। यदि जदयू मजबूत संख्या के साथ उभरती, तो सरकार में उनकी स्थिति और निर्णायक हो सकती थी; लेकिन भाजपा की शुरुआत से बढ़त इस दिशा में संकेत दे रही थी कि सत्ता समीकरण में बदलाव संभव है। जदयू के पारंपरिक क्षेत्रों में मिले मिश्रित संकेत यह भी दर्शाते रहे कि मतदाता व्यवहार में बदलाव हुआ है और यह बदलाव आने वाले वर्षों की नीति निर्माण प्रक्रिया को प्रभावित कर सकता है।
मतगणना के दौरान सुरक्षा, माहौल और विपक्ष की उम्मीदें
243 सीटों की मतगणना सुबह 8 बजे शुरू हुई और सुरक्षा व्यवस्था कई स्तरों पर की गई थी। केंद्रीय सशस्त्र सुरक्षा बलों ने आंतरिक घेरे को संभाला, जबकि राज्य पुलिस ने बाहरी क्षेत्रों की निगरानी की। हर केंद्र में अधिकृत पास वाले ही प्रवेश कर सकते थे और मोबाइल फोन पूरी तरह प्रतिबंधित रहे। 243 रिटर्निंग ऑफिसर और उतने ही काउंटिंग ऑब्ज़र्वर मतगणना की निगरानी कर रहे थे, जबकि 18,000 से अधिक एजेंट उपस्थित थे ताकि किसी भी अनियमितता की गुंजाइश न रहे।
पटना स्थित राजनीतिक मुख्यालयों में माहौल लगातार बदलता रहा—कहीं उत्साह, कहीं बेचैनी, और कहीं यह उम्मीद कि आगे के राउंड उनकी स्थिति मजबूत करेंगे। एनडीए के नेताओं ने जैसे ही रुझान स्थिर होने शुरू हुए, इसे प्रधानमंत्री मोदी की ‘गारंटी’ और नीतीश मॉडल की स्वीकृति बताया। दूसरी तरफ, महागठबंधन ने अपने पक्ष में बदलाव की संभावना पर भरोसा बनाए रखा और कहा कि ग्रामीण और पिछड़े इलाकों के वोट बाद के राउंड में तस्वीर बदल सकते हैं।
आरजेडी के नेतृत्व वाली महागठबंधन ने चुनाव प्रचार में बेरोजगारी, महंगाई और सुधार की जरूरत जैसे मुद्दों को प्रमुखता दी थी। तेजस्वी यादव ने युवा चेहरे के रूप में यह दावा किया कि बिहार को नई दिशा की जरूरत है और वह इसका विकल्प प्रदान करते हैं। उनकी रैलियों में युवा और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों की उपस्थिति उल्लेखनीय थी। हालांकि, शुरुआती रुझानों ने यह स्पष्ट कर दिया कि यह रणनीति व्यापक स्तर पर वैसा प्रभाव नहीं डाल पाई जैसा महागठबंधन अपेक्षा कर रहा था।
इस चुनावी प्रक्रिया में 7 करोड़ से अधिक मतदाताओं ने हिस्सा लिया था। यह विशाल मतदान प्रतिशत न केवल लोकतांत्रिक प्रक्रिया के प्रति जनता की जागरूकता को दर्शाता है बल्कि यह भी दिखाता है कि बिहार में सत्ता परिवर्तन या सत्ता बनाए रखने का सवाल जनता के लिए कितना महत्वपूर्ण था। ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में व्यापक मतदान ने अनुमान लगाना मुश्किल कर दिया था कि किस तरफ हवा चल रही है, लेकिन मजबूत संगठन शक्ति के कारण एनडीए इस भारी वोटिंग का लाभ उठाता दिखाई दिया।
गिनती के हर नए अपडेट के साथ राजनीतिक विश्लेषक नए समीकरणों पर चर्चा करते रहे। बिहार की राजनीतिक संरचना में जाति-आधारित मतदान, क्षेत्रीय प्रभाव, विकास की अपेक्षाएँ और गठबंधन राजनीति का बड़ा हस्तक्षेप होता है। इसलिए छोटे बदलाव भी चुनावी दिशा को अप्रत्याशित रूप से बदल सकते हैं। इसी कारण भाजपा और जदयू की आंतरिक प्रतिस्पर्धा पूरे रुझान के दौरान चर्चा का केंद्र बनी रही, क्योंकि यह संभव था कि दोनों के बीच सीटों का अंतर भविष्य की सरकार में उनकी भूमिका को तय करेगा।
विपक्ष इस बीच यह दावा करता रहा कि नतीजों का शुरुआती रुझान केवल शुरुआती चरणों का प्रतिनिधित्व कर रहा है और जैसे-जैसे ग्रामीण इलाकों की मतगणना आगे बढ़ेगी, स्थिति बदल सकती है। हालांकि, घंटे दर घंटे एनडीए की बढ़त मजबूत होती गई, जिससे विपक्ष की उम्मीदें धीरे-धीरे कमजोर होने लगीं। राजनीतिक गलियारों में यह चर्चा भी शुरू हो गई कि यदि नतीजे इसी पैटर्न पर आगे बढ़े, तो महागठबंधन को अपने संगठनात्मक ढांचे और चुनावी रणनीति पर गंभीर पुनर्विचार करना पड़ सकता है।
चुनाव केंद्रों पर मतगणना बेहद व्यवस्थित रही। ईवीएम खोलने और जांचने की पूरी प्रक्रिया राजनीतिक एजेंटों की निगरानी में हुई ताकि पारदर्शिता बनी रहे। आयोग के अधिकारी लगातार यह सुनिश्चित करते रहे कि हर राउंड की गिनती तय समय और नियमों के अनुसार हो। किसी प्रकार की अनियमितता या तकनीकी समस्या की कोई बड़ी शिकायत दर्ज नहीं हुई, जिससे चुनाव आयोग की तैयारियाँ और निगरानी व्यवस्था की मजबूती भी सामने आई।
राज्य की जनता भी टीवी चैनलों, मोबाइल अपडेट और सोशल मीडिया के माध्यम से हर रुझान को बारीकी से देख रही थी। छोटे दुकानदारों, किसानों, छात्रों, और शहरों में नौकरी की तलाश कर रहे युवाओं—सभी की नजरें इस बात पर टिकी थीं कि कौन सी सरकार अगले पाँच वर्षों तक उनकी जिंदगी को प्रभावित करेगी। रोजगार, शिक्षा, कृषि नीतियाँ, औद्योगिक निवेश, बुनियादी ढाँचा और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दे इस चुनाव में केंद्र में रहे और मतदाता इन्हीं आधारों पर नतीजों की दिशा को लेकर आशान्वित या चिंतित दिखे।
बिहार की राजनीति हमेशा से बदलावों का केंद्र रही है—कभी सामाजिक न्याय की लहर, कभी विकास का एजेंडा, और कभी गठबंधनों का जटिल गणित। 2025 का यह चुनाव भी इस क्रम में एक और महत्वपूर्ण अध्याय जोड़ रहा था, जहाँ एनडीए की बढ़त, भाजपा–जदयू की आपसी प्रतिस्पर्धा, महागठबंधन की उम्मीदें और जनता की भारी भागीदारी ने एक ऐसा चुनावी परिदृश्य बनाया जो आने वाले वर्षों की राजनीति और शासन मॉडल को गहराई से प्रभावित करेगा।
