तमिलनाडु में राजनीतिक माहौल उस समय और गर्मा गया जब नगर प्रशासन और जल संसाधन मंत्री के एन नेहरू ने प्रवर्तन निदेशालय पर गंभीर आरोप लगाए कि विपक्षी एआईएडीएमके–भाजपा गठबंधन के इशारे पर उनके खिलाफ योजनाबद्ध तरीके से एक “मानहानि अभियान” चलाया जा रहा है। नेहरू ने कहा कि उनके विभाग के खिलाफ भ्रष्टाचार के मामलों को बार-बार उजागर करना राजनीतिक उद्देश्य से प्रेरित है तथा वे इन सभी आरोपों का कानूनी रूप से सामना करेंगे। पिछले तीन महीनों में यह दूसरा अवसर है जब ईडी ने उनके विरुद्ध बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया है, जिससे आगामी 2026 के विधानसभा चुनावों के मद्देनज़र विवाद और गहराता जा रहा है।
टेंडर घोटाले, रिश्वतखोरी और पूर्वनिर्धारित अनुबंधों के आरोपों पर ईडी का ताजा दावा बढ़ा तनाव
ईडी के नवीनतम आरोपों में कहा गया है कि नेहरू ने अपने विभाग में टेंडर जारी करते समय 7.5% से 10% तक की रिश्वत वसूली। एजेंसी का दावा है कि इस कथित भ्रष्टाचार से लगभग ₹1,020 करोड़ की अवैध कमाई हुई। ईडी ने अपनी रिपोर्ट में कहा कि यह रिश्वतखोरी व्यवस्थित रूप से चलने वाली प्रक्रिया का हिस्सा थी, जिसमें विभागीय ठेकों को देने से पहले ही लाभार्थियों और धन के वितरण के तरीके तय कर लिए जाते थे।
एजेंसी द्वारा तैयार किया गया दस्तावेज़ 252 पन्नों का बताया जा रहा है, जिसमें बैंक लेनदेन, व्हाट्सऐप चैट और कथित तौर पर मंत्री के रिश्तेदारों के माध्यम से हुए भुगतान के विवरण शामिल किए गए हैं। हालांकि, इसे सार्वजनिक नहीं किया गया क्योंकि राज्य गृह विभाग पहले से ही अक्टूबर में हुए पहले “लीक” की जांच कर रहा है।
यह मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि अक्टूबर में ईडी ने नेहरू पर 2,538 सरकारी पदों की भर्ती में प्रति पद ₹35 लाख की रिश्वत लेने का आरोप लगाया था। उस समय भी विपक्ष ने इस आरोप को चुनावी रणनीति बताते हुए सरकार को घेरा था, जबकि डीएमके ने इसे मनगढ़ंत और राजनीतिक रूप से प्रेरित बताया था। नया मामला सामने आने से मंत्रालय और प्रशासनिक ढांचे में फिर से खलबली मच गई है।
राज्य के एक वरिष्ठ अधिकारी ने बताया कि ईडी के पास मौजूद प्रमाणों से ऐसा प्रतीत होता है कि कई ठेकों के विजेता बोलीदाता पहले से तय थे, जबकि टेंडर की अंतिम बोली प्रक्रिया केवल औपचारिकता भर थी। उन्होंने कहा कि उपलब्ध बैंक स्टेटमेंट, डिजिटल संवाद और धन के कथित बहाव की शृंखला इस बात की ओर संकेत करती है कि भ्रष्टाचार का जाल समय के साथ विकसित हुआ तथा इसमें अनेक मध्यस्थ सक्रिय थे।
अधिकारी ने यह भी स्पष्ट किया कि ईडी द्वारा भेजे गए नवीनतम पत्र की प्रति साझा नहीं की जा सकती क्योंकि पहले लीक हुए दस्तावेज़ को लेकर चल रही जांच अभी पूरी नहीं हुई है।
इन आरोपों के चलते राज्य की राजनीति में उबाल तेज हो गया है। विपक्षी दल एआईएडीएमके और भाजपा लगातार आरोप लगा रहे हैं कि डीएमके सरकार के अंदर भ्रष्टाचार चरम पर है। वहीं, नेहरू और उनके समर्थकों का कहना है कि ईडी जानबूझकर चुनाव से पहले उनके खिलाफ कार्रवाई को हवा दे रही है।
नेहरू का प्रत्यारोप — राजनीतिक बदले की कार्रवाई बताकर कानूनी लड़ाई की चेतावनी
नेहरू ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि ईडी की गतिविधियाँ राजनीतिक प्रतिशोध से प्रेरित हैं और विपक्षी दल उन्हें बदनाम कर 2026 के चुनावों में लाभ लेने की कोशिश कर रहे हैं। उनका कहना है कि यदि जांच प्रक्रिया वास्तव में निष्पक्ष होती, तो दस्तावेज़ों के लीक होने जैसे संवेदनशील घटनाक्रम बार-बार सामने नहीं आते। उनके अनुसार, यह लीक स्वयं इस बात का प्रमाण है कि प्रक्रिया का उपयोग सार्वजनिक धारणा को प्रभावित करने के लिए किया जा रहा है।
नेहरू ने यह भी कहा कि केवल डिजिटल साक्ष्य या बैंक लेनदेन को जोड़कर भ्रष्टाचार का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं है। उनका तर्क है कि ईडी की रिपोर्टें अनुमान और एकतरफा व्याख्या पर आधारित हैं, जबकि कानूनी प्रक्रिया में प्रत्येक संदेहास्पद लेनदेन का पूर्ण संदर्भ महत्वपूर्ण होता है।
उन्होंने कहा कि उनकी कानूनी टीम सभी आरोपों को चुनौती देने के लिए पूरी तैयारी कर रही है और वे अदालत में साबित करेंगे कि ईडी द्वारा प्रस्तुत आंकड़े भ्रामक और अपूर्ण तथ्य पर आधारित हैं।
डीएमके नेताओं का मानना है कि केंद्र सरकार की एजेंसियों द्वारा विपक्ष-शासित राज्यों को निशाना बनाने का राष्ट्रीय स्तर पर एक पैटर्न दिख रहा है। उनका तर्क है कि ईडी, सीबीआई और आईटी विभाग की कार्रवाई अक्सर उन राज्यों में तेज हो जाती है जहाँ चुनाव नजदीक होते हैं। नेहरू का मामला भी इसी श्रृंखला का हिस्सा बताकर डीएमके इसे एक “राजनीतिक साजिश” के रूप में प्रस्तुत कर रही है।
दूसरी ओर, ईडी यह दावा करती है कि उसकी जांच पूरी तरह सबूतों पर आधारित है और राजनीति से इसका कोई लेना-देना नहीं। लेकिन जाँच रिपोर्टों के लीक होने और राजनीतिक बहस में इनके इस्तेमाल से जनता के बीच संदेह और ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, जिसके नतीजे 2026 के चुनावों पर सीधा प्रभाव पड़ सकता है।
इस बीच, स्वास्थ्य, नगर प्रशासन और जल संसाधन विभागों में कार्यरत कर्मचारियों और अधिकारियों में भी असमंजस की स्थिति है। भ्रष्टाचार के आरोपों के कारण विभागीय कार्यों पर दबाव बढ़ सकता है, और विपक्ष द्वारा इसे चुनावी मुद्दा बनाने की पूरी संभावना है।
