तमिलनाडु की राजनीति में सोमवार को बड़ा मोड़ तब आया जब विपक्षी दलों, विशेषकर द्रविड़ मुनेत्र कड़गम (DMK) के नेतृत्व में, मद्रास उच्च न्यायालय के न्यायाधीश जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव लाने की प्रक्रिया को अंतिम रूप देने की तैयारी शुरू कर दी। यह कदम न्यायाधीश द्वारा करथिगै दीपम दीप जलाने से जुड़े विवादित निर्णय के बाद उठाया गया, जिसने मदुरै के तिरुपरनकुंड्रम पर्वत से जुड़ी धार्मिक परंपराओं और सामाजिक सामंजस्य पर गहरी राजनीतिक बहस छेड़ दी है। 2026 के विधानसभा चुनावों की आहट के बीच यह मुद्दा स्थानीय स्तर से निकलकर राष्ट्रीय राजनीतिक विमर्श का हिस्सा बन गया है।
विपक्ष ने न्यायाधीश जी.आर. स्वामीनाथन के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव के लिए आवश्यक समर्थन जुटाया
विपक्षी दलों ने संसद में महाभियोग प्रस्ताव लाने के लिए आवश्यक संख्या में हस्ताक्षर एकत्र कर लिए हैं। संविधान के अनुसार, किसी उच्च न्यायालय के वर्तमान न्यायाधीश को हटाने के लिए लोकसभा में कम से कम 100 और राज्यसभा में 50 सांसदों के हस्ताक्षर आवश्यक होते हैं। DMK के वरिष्ठ सांसदों के अनुसार, यह प्रक्रिया लगभग पूरी हो चुकी है और प्रस्ताव संसद में मंगलवार या बुधवार को पेश किया जा सकता है।
DMK के एक वरिष्ठ सांसद ने बताया कि लोकसभा से आवश्यक “100 हस्ताक्षर प्राप्त कर लिए गए” हैं और अन्य विपक्षी दलों से भी समर्थन मिल रहा है। कांग्रेस के तमिलनाडु के एक सांसद ने यह पुष्टि की कि उनकी पार्टी के सांसदों ने प्रस्ताव पर हस्ताक्षर कर दिए हैं और अंतिम निर्णय विपक्षी गठबंधन की बैठक में लिया जाएगा।
विपक्ष का मानना है कि न्यायाधीश का करथिगै दीपम दीप प्रज्ज्वलन से जुड़ा निर्णय न केवल पारंपरिक धार्मिक प्रथाओं को प्रभावित करता है बल्कि तिरुपरनकुंड्रम क्षेत्र में सदियों से चली आ रही सामाजिक और सांस्कृतिक सौहार्द की भावना को भी असंतुलित कर सकता है। विपक्ष का तर्क है कि न्यायिक निर्णयों का सामाजिक ताने-बाने पर गहरा प्रभाव पड़ता है और ऐसी स्थिति में संसद के माध्यम से जवाबदेही सुनिश्चित करना जरूरी है।
महाभियोग प्रस्ताव की यह पहल न्यायपालिका और राजनीति के बीच संतुलन पर गंभीर प्रश्न खड़े करती है और यह दर्शाती है कि करथिगै दीपम विवाद अब एक व्यापक सामाजिक-राजनीतिक मुद्दा बन चुका है।
तिरुपरनकुंड्रम पर्वत पर धार्मिक संवेदनशीलता और 2026 चुनावों से पहले बढ़ते तनाव
तिरुपरनकुंड्रम पर्वत मदुरै के सबसे पवित्र स्थलों में से एक है। यहां सुब्रमण्य स्वामी मंदिर, काशी विश्वनाथ मंदिर और सिकंदर बादूशा दरगाह स्थित हैं, जिनके कारण यह स्थान विभिन्न आस्थाओं के शांतिपूर्ण सह-अस्तित्व का प्रतीक माना जाता रहा है। दशकों से यहां किसी बड़े विवाद की स्थिति उत्पन्न नहीं हुई थी, लेकिन फरवरी में स्थिति अचानक बदल गई जब कुछ लोगों द्वारा पहाड़ी पर मांसाहार किए जाने के आरोपों को लेकर हिंदू मुन्नानी के सदस्यों ने विरोध प्रदर्शन किया।
इस घटना ने पर्वत के धार्मिक महत्व को लेकर समुदायों के बीच नए तनाव पैदा कर दिए। हालांकि प्रशासन ने मामला शांत कराने की कोशिश की, लेकिन यह स्पष्ट हो गया कि पर्वत की मर्यादा और परंपराओं को लेकर नई राजनीतिक बहस शुरू हो चुकी है।
इसी पृष्ठभूमि में न्यायाधीश स्वामीनाथन का करथिगै दीपम दीपक जलाने संबंधी फैसला सामने आया, जिसे विपक्ष ने “संवेदनशील धार्मिक मुद्दे में न्यायिक हस्तक्षेप” के रूप में देखा। विपक्ष का आरोप है कि यह निर्णय उन समूहों को बल दे सकता है जो धार्मिक स्थलों को राजनीतिक एजेंडे के लिए उपयोग करना चाहते हैं, खासकर तब जब राज्य में चुनाव नजदीक हों।
करथिगै दीपम तमिलनाडु के प्रमुख त्योहारों में से है, जिसमें पारंपरिक रूप से पर्वत शिखर पर दीप जलाया जाता है। विपक्ष को आशंका है कि न्यायिक व्याख्या इस परंपरा के स्वरूप और व्यवस्थाओं पर अनचाहा प्रभाव डाल सकती है। उनका कहना है कि इस तरह के निर्णय यदि सामाजिक परिस्थितियों को समझे बिना लिए जाएँ, तो वे सांप्रदायिक संतुलन को प्रभावित कर सकते हैं।
दूसरी ओर, न्यायाधीश के समर्थक यह तर्क देते हैं कि उनका निर्णय पूरी तरह विधिक सिद्धांतों और उपलब्ध तथ्यों पर आधारित है, और महाभियोग जैसी कठोर प्रक्रिया को राजनीतिक प्रतिशोध के औज़ार के रूप में नहीं इस्तेमाल किया जाना चाहिए।
फिर भी, जैसे-जैसे राजनीतिक दल महाभियोग प्रस्ताव पर आगे बढ़ रहे हैं, यह स्पष्ट हो रहा है कि तिरुपरनकुंड्रम पर्वत का विवाद अब सिर्फ धार्मिक परंपराओं से जुड़ा मुद्दा नहीं रहा, बल्कि राज्य की राजनीति, साम्प्रदायिक संतुलन और न्यायपालिका की भूमिका पर व्यापक विमर्श का केंद्र बन गया है। आगामी विधानसभा चुनावों से पहले यह विवाद तमिलनाडु की राजनीतिक दिशा को प्रभावित करने की क्षमता रखता है।
